बिलासपुर से सामने आई इन तस्वीरों ने एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है।तस्वीरों में भगवान श्री राम और महाराणा प्रताप की मूर्तियां खुले स्थान पर पेड़-पौधों और झाड़ियों के बीच रखी हुई दिखाई दे रही हैं।
झांकियों में पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ शामिल किया जाता है, कार्यक्रम खत्म होने के बाद आखिर उनकी देखरेख कौन करता है?
सवाल सीधा है—जिम्मेदार कौन है???
आयोजन के दौरान तो भगवान श्री राम और महापुरुषों की प्रतिमाओं को सम्मान के साथ सजाया जाता है, लेकिन आयोजन खत्म होने के बाद अगर उन्हें इस तरह खुले में छोड़ दिया जाए, तो क्या इसे उचित माना जा सकता है?
हमारा मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।
लेकिन सवाल उठाना जरूरी है, क्योंकि सम्मान सिर्फ कार्यक्रम और झांकी तक सीमित नहीं होना चाहिए।अगर इन मूर्तियों को रखने के लिए कोई निर्धारित स्थान नहीं है, तो आयोजकों को इसकी व्यवस्था करनी चाहिए।और अगर यह सार्वजनिक स्थान से जुड़ा मामला है, तो स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग की भी जिम्मेदारी बनती है कि ऐसी स्थिति दोबारा सामने न आए।
सवाल उन लोगों से है, जिन्होंने इन मूर्तियों का इस्तेमाल झांकी में किया—क्या कार्यक्रम खत्म होने के बाद आपकी जिम्मेदारी भी खत्म हो जाती है? सवाल शासन-प्रशासन से भी है—
क्या धार्मिक आयोजनों और झांकियों में इस्तेमाल होने वाली ऐसी प्रतिमाओं को सुरक्षित और सम्मानजनक स्थान पर रखने के लिए कोई व्यवस्था या दिशा-निर्देश हैं?
अगर हैं, तो उनका पालन क्यों नहीं हो रहा?
और अगर नहीं हैं, तो क्या अब प्रशासन इस दिशा में कोई व्यवस्था बनाएगा?
क्योंकि भगवान श्री राम हों या महाराणा प्रताप—इनका सम्मान केवल मंच और झांकी तक सीमित नहीं होना चाहिए।
इन तस्वीरों को देखकर अब सिर्फ सवाल नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।आखिर इन मूर्तियों को इस हालत में रखने वाला जिम्मेदार कौन है?
आयोजक? समिति? संबंधित विभाग? या प्रशासन?
अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस मामले में संज्ञान लेता है या नहीं और क्या इन मूर्तियों को सुरक्षित एवं सम्मानजनक स्थान दिलाने की जिम्मेदारी उठाई जाती है।






