साइंस कॉलेज झूला विवाद: विवाद खत्म, लेकिन मैदान की बदहाली ने खड़े किए नए सवाल… आखिर जिम्मेदारी कौन लेगा?
बिलासपुर के साइंस कॉलेज मैदान में झूला लगाने को लेकर सामने आया विवाद अब एक नए सवाल में बदल गया है।विवाद झूले और प्रबंधन के बीच था, लेकिन इसकी कीमत अब खिलाड़ियों और बच्चों को क्यों चुकानी पड़ रही है?झूला संचालक का कहना है कि बड़े मैदान में झूला लगाने के लिए अनुमति ली गई थी और नगर निगम को टैक्स भी दिया गया था। बाद में उन्हें मैदान के दूसरे हिस्से में जगह दी गई। संचालक की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि उस जगह पर बीच-बीच में कॉलेज प्राचार्य द्वारा ताला लगाया जाता था।वहीं, संचालक ने मैदान के किराए को लेकर भी कई दावे किए हैं। उनके अनुसार प्रतिदिन किराए की राशि 25 हजार रुपये बताई गई थी, जबकि पार्किंग को लेकर पहले 2 हजार और बाद में 10 हजार रुपये तक मांगे जाने का आरोप है। संचालक का दावा है कि उन्होंने नगर निगम का टैक्स जमा किया, जरूरी औपचारिकताएं पूरी कीं और हाईकोर्ट की अनुमति के साथ एसडीएम के संज्ञान में भी मामला लाया गया।
हालांकि इन दावों और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।
विवाद बढ़ने के बाद झूले समय से पहले हटा दिए गए। लेकिन अब झूले हटने के बाद मैदान की जो तस्वीर सामने आई है, वह अपने आप में कई सवाल खड़े कर रही है।मैदान में जगह-जगह कचरा, प्लास्टिक, लकड़ियां और अन्य सामग्री बिखरी हुई है। कई स्थानों पर गड्ढे भी दिखाई दे रहे हैं।यही वह मैदान है जहां रोजाना बच्चे क्रिकेट, रनिंग और एक्सरसाइज के लिए पहुंचते हैं। बारिश के मौसम में यहां स्केटिंग जैसी गतिविधियां भी होती हैं।
अब सवाल यह है कि—
मैदान की इस बदहाल स्थिति की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
क्या मैदान की सफाई और नुकसान की भरपाई झूला संचालक को करनी चाहिए थी?
क्या कॉलेज प्रबंधन को मैदान को पूर्व स्थिति में लाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए?
या फिर नगर निगम और संबंधित विभाग को पूरे मामले की जांच कराकर मैदान की स्थिति सुधारनी चाहिए?
क्योंकि झूला विवाद चाहे दो पक्षों के बीच का मामला रहा हो, लेकिन मैदान की बदहाली का सीधा असर उन बच्चों और खिलाड़ियों पर पड़ रहा है, जिनके लिए यह मैदान सबसे जरूरी है।जरूरत है कि जिम्मेदार विभाग पूरे मामले की जांच करें, नुकसान का आकलन करें और मैदान को जल्द से जल्द साफ कर खिलाड़ियों और शहरवासियों के उपयोग के योग्य बनाया जाए।
क्योंकि विवाद किसी का भी हो…
मैदान बच्चों और खिलाड़ियों का है।
और सवाल सिर्फ कचरे का नहीं—जिम्मेदारी का भी है।




