मजदूरी करते हुए पढ़ाई, छात्रवृत्ति के सहारे पीएचडी तक पहुंचे डॉ. नरेश तिवारी‘ हमर पहुना’ में महर्षि यूनिवर्सिटी के कुलपति ने साझा की संघर्ष से सफलता तक की जीवन यात्रा

मजदूरी करते हुए पढ़ाई, छात्रवृत्ति के सहारे पीएचडी तक पहुंचे डॉ. नरेश तिवारी‘ हमर पहुना’ में महर्षि यूनिवर्सिटी के कुलपति ने साझा की संघर्ष से सफलता तक की जीवन यात्रा

बिलासपुर। पिता का महज छह वर्ष की उम्र में निधन, परिवार की जिम्मेदारी उठाती मां और पढ़ाई के साथ मजदूरी—इन चुनौतियों के बीच शिक्षा का सफर जारी रखते हुए छात्रवृत्ति के सहारे पीएचडी तक पहुंचने की कहानी महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी (MUMT), बिलासपुर के कुलपति डॉ. नरेश तिवारी ने साझा की। रविवार को बिलासपुर प्रेस क्लब के पारंपरिक कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष, वैज्ञानिक अनुभव, शिक्षा के क्षेत्र में योगदान और विश्वविद्यालय की भविष्य की योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की।डॉ. तिवारी ने बताया कि उनका जन्म बुंदेलखंड के सागर जिले में हुआ। पिता के निधन के बाद उनकी मां ने मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण किया और बच्चों की पढ़ाई को कभी नहीं रुकने दिया। उन्होंने स्वयं भी बाल अवस्था से मजदूरी करते हुए पढ़ाई जारी रखी। कक्षा छठवीं से पीएचडी तक उन्हें शासन की छात्रवृत्ति मिली, जिसके सहारे उन्होंने उच्च शिक्षा पूरी की। एमटेक के बाद उन्होंने रिमोट सेंसिंग में पीएचडी की और मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया।

बिलासपुर के गांव-गांव पहुंचकर किया अध्ययन

वैज्ञानिक के रूप में काम करते हुए डॉ. तिवारी का कार्यक्षेत्र छत्तीसगढ़ भी रहा। उन्होंने बिलासपुर जिले की भौगोलिक संरचना और भूगोल का अध्ययन करते हुए गांव-गांव का दौरा किया। कोरबा में खनन गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों पर भी अध्ययन किया। खनन के बाद पर्यावरण पर पड़ने वाले असर और कंपनियों द्वारा किए गए पौधरोपण सहित अन्य उपचारात्मक कार्यों की प्रभावशीलता का अध्ययन किया। जबलपुर और बस्तर में खनिज अन्वेषण से जुड़े कार्यों में भी उन्होंने योगदान दिया।वैज्ञानिक के रूप में कई उपलब्धियां हासिल करने के बाद भी उनके मन में यह सवाल बना रहा कि उनके बाद उनके काम को आगे कौन बढ़ाएगा। इसी सोच ने उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया।

शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के लिए छोड़ी सरकारी नौकरी

डॉ. तिवारी ने बताया कि वर्ष 2003 में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विभाजन के बाद उन्हें सी.वी. रमन विश्वविद्यालय में प्रतिनियुक्ति भेजा गया। वहां दो वर्ष प्राध्यापक के रूप में काम करने के दौरान उन्हें उच्च शिक्षा व्यवस्था को करीब से समझने का अवसर मिला। वर्ष 2008 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काम शुरू किया।इसके बाद उन्होंने ओरिएंटल ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स और बंसल ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स में विभिन्न जिम्मेदारियां संभालीं। उन्होंने विद्यार्थियों की कम उपस्थिति को शिक्षा क्षेत्र की बड़ी चुनौती बताया। एक संस्थान में नियमों के तहत कम उपस्थिति वाले 238 विद्यार्थियों को डिटेन करने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि दबाव के बावजूद नियमों से समझौता नहीं किया गया और बाद में विद्यार्थियों की उपस्थिति व अनुशासन में बदलाव देखने को मिला।डॉ. तिवारी के अनुसार, उन्होंने ओरिएंटल विश्वविद्यालय, श्याम बिहारी विश्वविद्यालय, मध्य छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय, श्रीकृष्ण विश्वविद्यालय और आर्या विश्वविद्यालय की स्थापना में संस्थापक सलाहकार के रूप में योगदान दिया। इसके अलावा बिलासपुर विश्वविद्यालय और छविंद्र विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में भी कार्य किया।

छह माह में 13 संस्थाओं से एमओयू, दो यूके पेटेंट

महर्षि यूनिवर्सिटी में कुलपति के रूप में करीब छह माह के कार्यकाल की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि अब तक 13 विभिन्न संस्थाओं के साथ एमओयू किए जा चुके हैं। इनमें बीएनआई, जनजातीय अनुसंधान एवं विज्ञान केंद्र नई दिल्ली और क्षेत्र के विभिन्न विश्वविद्यालय शामिल हैं। इन संस्थाओं के साथ नवाचार, अनुसंधान और जनजातीय समाज से जुड़े विषयों पर काम किया जा रहा है।उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय से जुड़े दो पेटेंट यूके में पंजीकृत हुए हैं। इनमें एक कंप्यूटर डिवाइस और दूसरा एआई आधारित डिवाइस शामिल है। इनके उपयोग और आगे के अनुसंधान पर कार्य जारी है। विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा 30 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए गए हैं, जबकि 13 से अधिक पुस्तक अध्याय और पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं।

आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा पर जोर

डॉ. तिवारी ने कहा कि महर्षि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल आधुनिक शिक्षा तक सीमित रहना नहीं है। विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परंपरा, योग, वेद, ध्यान और भारतीय मूल्यों को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि महर्षि महेश योगी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को दुनिया के 117 देशों तक पहुंचाया और विश्वविद्यालय उसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।कार्यक्रम के दौरान डॉ. तिवारी ने पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुए अपने वैज्ञानिक जीवन, शिक्षा व्यवस्था, विश्वविद्यालय प्रशासन और भविष्य की योजनाओं से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की।

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