लिंगियाडीह में फूट रहा जन-आक्रोश, 93 दिनों से सड़कों पर ‘मातृशक्ति’

 

बिलासपुर  न्यायधानी के लिंगियाडीह क्षेत्र में गरीबों के आशियाने पर मंडरा रहे संकट ने अब एक भीषण जन-आंदोलन का रूप ले लिया है। अपने सिर की छत और घर की एक-एक ईंट को बचाने के लिए यहाँ की महिलाएं पिछले 93 दिनों से कड़ाके की ठंड और खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठी हैं। विडंबना यह है कि प्रदेश में ‘सुशासन’ का दावा करने वाली सरकार और स्थानीय विधायक सत्ता पक्ष के हैं, इसके बावजूद धरातल पर नगर निगम का अमला उन्हीं गरीबों को उजाड़ने की तैयारी में है, जिन्होंने उन्हें चुनकर सत्ता तक पहुँचाया।

निर्णायक मोड़ पर आंदोलन: विपक्ष ने भरी हुंकार

आंदोलन के 93वें दिन धरना स्थल पर तब भारी गहमागहमी मच गई जब कांग्रेस पार्षदों और विपक्षी नेताओं ने इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ देने का ऐलान कर दिया। आंदोलन में मुख्य रूप से जिला अध्यक्ष (अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा) राजीव रतन सिंह ‘रिक्की’ ने पहुँचकर अपना समर्थन दिया। उन्होंने मंच से हुंकार भरते हुए कहा कि सत्ता के संरक्षण में निगम के अधिकारी तानाशाही पर उतारू हैं, लेकिन वे गरीबों के सिर से छत छिनने नहीं देंगे।

प्रशासन की नीयत पर गंभीर सवाल स्थानीय निवासियों का आरोप है कि कुछ रसूखदार नेताओं के इशारे पर निगम प्रशासन बस्तियों पर बुलडोजर चलाने का षड्यंत्र रच रहा है। आंदोलन में शामिल डॉ. रघु साहू, वार्ड पार्षद दिलीप पाटिल और श्याम मूरत कौशिक ने प्रशासन को दो-टूक चेतावनी देते हुए कहा कि अधिकारी अपनी फाइलों से बाहर निकलकर इन महिलाओं का दर्द देखें।

 

“एक तरफ सरकार पक्के मकान देने का वादा करती है, वहीं दूसरी तरफ बसे-बसाए घरों को उजाड़ना समझ से परे है। यदि इस दमनकारी नीति को नहीं रोका गया, तो यह आक्रोश सरकार के लिए भारी पड़ेगा।”

प्रदर्शनकारी महिलाएं

93 दिनों का धैर्य अब बन रहा है सैलाब

यह केवल एक धरना नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। कड़ाके की ठंड में 93 दिनों तक डटे रहना प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है। आज के इस विशाल सर्वदलीय महाधरना आंदोलन में सैकड़ों की संख्या में क्षेत्रीय लोग उपस्थित थे।

प्रमुख रूप से उपस्थित जन:

आंदोलन में यशोदा पाटिल, सुखमति, लता देवांगन, पुष्पा देवांगन, राजकुमारी, साधना यादव, कल्पना यादव, सिद्धार्थ भारती, आदर्श सेवते, लखन कश्यप, लक्ष्मी लाल केवंट सहित सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने अपनी आवाज बुलंद की। अधिकारियों की चुप्पी और सत्ता पक्ष की अनदेखी ने क्षेत्र के असंतोष की आग में घी डालने का काम किया है।

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